गरीब बॉय की कहानी
सोशल मीडिया पर आपने कई बार देखा होगा कि एक लड़का वीडियो में रो रहा है, अपने पापा की हालत दिखा रहा है, टूटा-फूटा घर, आंसुओं से भरी आंखें… लेकिन कुछ ही महीनों में वही लड़का महंगी कारों में घूमता दिखता है, फाइव स्टार होटल्स में वीडियो शूट करता है। क्या ये मुमकिन है? या फिर ये सब एक स्कैम है?
आज हम बात कर रहे हैं “गरीब बॉय” यानी सावन महाली की — एक ऐसा नाम जो एक वक्त पर हर सोशल मीडिया यूजर की जुबान पर था। पर आज जब उसी नाम के साथ करोड़ों का स्कैम जुड़ चुका है, तो जानना जरूरी है कि सच्चाई क्या है?

शुरुआती झटका: गरीब से अमीर… या स्कैमर?
सावन महाली झारखंड के एक छोटे से गांव में एक बेहद गरीब परिवार में पैदा हुआ। उसके पिता मजदूरी करते थे, और कभी-कभी तो दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो जाता था। लेकिन सावन ने छोटी उम्र में ही ये समझ लिया था कि अगर हालात बदलने हैं तो कुछ करना पड़ेगा।
उसी दौरान उसने देखा कि झारखंड का ही एक यूटूबर मनोज दे वीडियो बनाकर पैसे कमा रहा है। यही से शुरू होती है गरीब बॉय की डिजिटल जर्नी।
टिकटॉक से यूट्यूब तक का सफर
टिकटॉक पर उसने अपनी गरीबी को ही कंटेंट बना दिया। लोगों को वो पसंद आया, क्योंकि वो रिलेट कर पा रहे थे। उसका वीडियो “मैं गरीब हूँ” वायरल हो गया और यहां तक कि बड़े यूटूबर आशिष चंचलानी ने भी इसपर रिएक्शन दिया।
धीरे-धीरे वो रातों-रात फेमस हो गया, लेकिन उस वक्त टिकटॉक से कमाई ज्यादा नहीं होती थी। फिर आया इंस्टाग्राम और मनोज दे के कहने पर उसने यूट्यूब पर काम करना शुरू किया। पहली ही बार में उसे जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला — सिर्फ 2 महीने में 1 लाख सब्सक्राइबर!

खेल की शुरुआत
अब जो लड़का कभी आंसू बहाकर गरीबी दिखाता था, वही यूट्यूब से कमाई करके महंगी बाइक, कार और गोल्ड चेन लेने लगा। खर्चा इतना बढ़ गया कि आमदनी के मुकाबले कई गुना ज्यादा हो गया।
जब पब्लिक ने देखा कि जो “गरीब” था, वो अब ऐश कर रहा है, तो धीरे-धीरे उन्होंने वीडियो देखना बंद कर दिया। व्यूज़ गिरने लगे, किश्तें भरनी मुश्किल हो गईं और यहीं से शुरू हुआ नया स्कैमिंग प्लान।
बदली हुई रणनीति: गरीब बनने का नया नाटक
अब उसने फिर से गरीबी का नाटक शुरू किया — कभी रोस्ट वीडियो बनाए, कभी दूसरे क्रिएटर्स की कॉपी की, यहां तक कि वीडियो में वही कुत्ता और वही एक्सप्रेशन तक इस्तेमाल किया। लेकिन ये सब ज्यादा दिन नहीं चला।
तब शुरू हुआ डोनेशन और चंदा मांगने का सिलसिला। लोगों ने पैसे दिए, फिर से वो बाइक, नए कपड़े और होटल्स की वीडियो डालने लगा। जब पैसे खत्म हुए, तो फिर से रोना और “मैं गरीब हूँ” का ड्रामा।
ये एक सुस्पष्ट साइकल बन चुकी थी — गरीब बनो → डोनेशन लो → पैसा उड़ाओ → फिर से गरीब बनो।

असली स्कैम: कलर प्रिडिक्शन एप्स का जाल
फिर एक दिन एक दोस्त ने सावन को जल्दी पैसा कमाने का तरीका बताया — कलर प्रिडिक्शन गेम्स।
अब सावन वीडियो में कैश हाथ में लेकर कहता कि देखो, मैं कैसे “कलर गेम” से अमीर बना। बड़े-बड़े होटल्स, नोटों की गड्डी और वीडियो के अंत में कहता — “अगर आप भी अमीर बनना चाहते हो, तो टेलीग्राम ग्रुप जॉइन करो।”
यहां से असली स्कैम शुरू होता है।
क्या होता है कलर प्रिडिक्शन स्कैम?
- ये एप्स ना तो किसी गवर्नमेंट अथॉरिटी से अप्रूव्ड होते हैं, ना ही SEBI या RBI से रजिस्टर्ड।
- ये डेमो अकाउंट में आपको जीतते हुए दिखाते हैं जिससे आप लालच में आ जाते हैं।
- फिर आप असली पैसे लगाते हैं और हार जाते हैं, लेकिन प्रमोटर को मिलता है commission।
यानी आप हारे या जीते — गरीब बॉय कमाता ही है!

कई इंफ्लुएंसर्स शामिल
ये स्कैम सिर्फ सावन तक सीमित नहीं है। बहुत सारे छोटे-बड़े क्रिएटर्स इसी तरह के फेक ऐप्स को प्रमोट कर रहे हैं। कोई हर हफ्ते नई कार खरीदता दिखता है, कोई नोट गिनते हुए वीडियो डालता है — और इन सबका मकसद सिर्फ यही होता है कि आप उनके टेलीग्राम को जॉइन करें और अपना पैसा गंवा बैठें।
सरकार जब इस स्कैम पर सख्त हुई तो कई क्रिएटर्स जेल भी जा चुके हैं। लेकिन सावन अभी भी रुका नहीं है। अब उसने एक नया तरीका निकाला है — ट्रेडिंग स्कैम।
नया स्कैम: ट्रेडिंग डेमो जीत, असली पैसा हानि
अब वो फर्जी ट्रेडिंग ऐप्स पर डेमो अकाउंट में पैसा जीतता है और वीडियो बनाता है कि “देखो मैंने 50 हज़ार जीते!” और फिर कहता है कि आप भी टेलीग्राम ग्रुप जॉइन करो।
लेकिन हकीकत ये है कि ये ऐप्स न रजिस्टर्ड हैं, न सुरक्षित। और जब लोग पैसा लगाते हैं तो हार जाते हैं — लेकिन सावन को फिर भी commission मिल जाता है।

क्लाइमैक्स: अपना भी लॉस दिखाकर लोगों को झांसा देना
अब जब लोग हारने लगे तो सावन खुद का भी लॉस दिखाने लगा ताकि लोग सोचें – “अगर इसे भी नुकसान हो रहा है, तो ये फ्रॉड नहीं है।” लेकिन ये एक और मनोवैज्ञानिक चाल है — ताकि लोग अपना नुकसान भूलकर फिर से पैसा लगाएं।
और ये सब उन लोगों के साथ हो रहा है जिन्होंने कभी खुद के पास पैसे न होते हुए भी सावन को UPI से मदद की थी।
निष्कर्ष: ये सफर प्रेरणा है या धोखा?
अब सवाल ये उठता है:
क्या गरीबी से लड़ते हुए सावन ने जो रास्ता चुना, वो सही था?
एक लड़का जो अपने पिता को 100 रुपये के लिए किसी से उधार लेते देखता है, क्या वो लड़का अपने परिवार को बेहतर ज़िंदगी देने के लिए लोगों को धोखा दे, तो क्या वो जायज़ है?
ये तय करना आपके हाथ में है।
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अगली पोस्ट में…
हम बताएंगे कि कैसे आप खुद को ऐसे स्कैम्स से बचा सकते हैं — कौन-से संकेत बताते हैं कि आप किसी धोखे का शिकार हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर किसे फॉलो करें और किससे बचें।
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